08/04/2010

मनीष की कलम से आपकी खिदमत मे.......

१.कसम खुदा की शायरी का मिजाज़ हीं कुछ और होता
यक़ीनन शायरों की तादाद भी कुछ और होता ,
हर हुस्न दीदार करती शायरों की शायरी से
काश के कमबख्त ये आइना ना होता ।

२.कौन कमबख्त हदे आशिकी को बर्दाश्त कर पाया है
किसी ने शराब को तो किसी ने मौत को गले लगाया है ।

३.हो वक़्त बुरा तो हर पल इम्तेहान होता है
दुश्मन को छोड़ो दोस्त भी दगा दे जाता है ।

आज सुबह ही हमने ये शब्द गढ़े हैं आशा है आप
सबको पसंद आएगा । धन्यवाद् ।
एक टिप्पणी भेजें