07/04/2010

मनीष की कलम से आपके खिदमत मे ....

१.वक़्त की बेवफाई देखो कितने सितम ढाए हैं
कभी नफरत थी जिस गली से हमे आज वहीँ
घर बनाये हैं हमने ।
२.हमे सराबी कह कर क्या खूब इलज़ाम लगाया
है तुमने , जरा पैमाने से पूछो हमे ऐसा बनाया है
किसने ।
३.हर मर्ज़ की दवा होती तो दुआओं पे यकीन
कौन करता , सबूतों के बिना गवाहों पे यकीन
कौन करता,
शुकर है शाहजहाँ ने ताजमहल बना
दिया वरना उनके मोहब्बत पे यकीन कौन करता।
४.दूरियाँ चाहे कितनी भी हो ,
दर्द चाहे जितनी भी हो
तेरा दमन हमना छोरेगें
तुफा चाहे कितनी भी हो ।
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