23/03/2010

मनीष की कलम से आपके लिए { गौरफरमाइयेगा }

1. सरहदें कहाँ हवा को रोक पाई है
जिन्दगी कहाँ एक पल को थाम पाई है ,
ये बस मज़बूरी है ,वर्ना दूरियाँ कहाँ दोस्ती
को तोड़ पाई है । (मेरा सबसे पहला शायरी )
२.दूरियाँ चाहे जितनी भी हो , दर्द चाहे कितनी
भी हो तेरा दामन हम ना छोरेंगे तूफां चाहे -
कितनी भी हो ।
३.आँखे हीं बयां करती है हालाते दिल और -
मिजाजे इश्क पढ़े तो पार वर्ना आदाब जनाब ।
'''''''''कहते है की कला चाहे जो भी हो इन्सान को
विरासत मे मिलती है अगर ये तनिक भी सत्य है तो
मै जो भी कुछ लिख पाता हूँ ये निश्चित हीं मेरे "नाना जी ''का
तनिक सा छाप है वर्ना मेरे खानदान मे किसी को शायरी या
कविता लिखने से दूर -दूर से वास्ता नहीं है , इसकेलिए मै नानाजी
का धन्यवाद् करता हूँ की उनकी कुछ झलक मुझमे आया ,परिवार
वाले तो सायद जानते तक नहीं क्योंकि मै सुदूर देहात से हूँ अगर
वो जानेगे तो मुझे निकम्मा ही समझेंगे । खैर जो भी हो फिर से अर्ज़ है -
४.कब मुकम्मल हुई है जिन्दगी बगैर इश्क के ,
वो और बात है की हदे आशिकी- तोड़-शख्स (लोग )
दफ़न हुए हैं इश्क मे ।
है बहुत और बस इज़ाज़त आपका चाहिए गर
पसंद हो तो मनीष की शायरी , नापसंद हो तो यहीं पे रोक डालिए.........
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